केंद्र सरकार ने ‘द इकोनॉमिस्ट’ की टिप्पणियों को पक्षपाती बताते हुए दिया जवाब, लिखा पत्र

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने बुधवार को द इकोनॉमिस्ट (The Economist) द्वारा छापे गए एक लेख की सभी टिप्पणियों को खारिज करते हुए एक पत्र लिखा है. 16 अक्टूबर को ‘द इकोनॉमिस्ट’ में प्रकाशित एक लेख में सरकार द्वारा टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर जरूरत से ज्यादा ज़ोर देने और गरीब जनता को पीछे छोड़ने का आरोप लगाया था. सरकार ने इस लेख में छपे हर बिंदु का बिंदुवार जवाब देते हुए कहा है कि इस तरह का लेख पत्रकारिता में परिश्रमशीलता की कमी (Lack of journalistic diligence) और गाइडेड रिपोर्ट करार दिया है. कहा गया है कि इसी के परिणामस्वरूप ये लेख पक्षपाती और गलत है, जिसमें सम्मानित प्रकाशन द्वारा अपनी ही पुरानी रिपोर्ट्स का ही खंडन किया गया है.

द इकोनॉमिस्ट ने आधार कार्ड से संबंधित सवाल उठाते हुए लिखा था कि हालांकि इसके कई फायदे हुए हैं, फिर भी भारत की करोड़ों लोग जिनमें कि गरीब, अनपढ़, बिना बिजली के रहने वाले, जिनके पास स्मार्टफोन या मोबाइल नहीं या वाई-फाई नेटवर्क नहीं है, इससे वंचित हैं. इस पर केंद्र ने आधार बनाने से जुड़े आंकड़े देते हुए कहा है कि 21 जून 2021 तक 18 साल से ऊपर 129.48 करोड़ लोगों के कार्ड बन चुके हैं और लोगों को लगातार डिजिटल आइटेंटिटी से जोड़ा जा रहा है.

कोविड प्रबंधन पर सवाल
कोविड की वैक्सीन में देरी का कारण ऑनलाइन बुकिंग (क्योंकि ये साइट ज्यादातर अंग्रेजी में थी) को बताते हुए प्रकाशन द्वारा किए गए सवाल को भी सरकार ने खारिज किया है. सरकार ने कहा है कि ये पोर्टल 10 भाषाओं में उपलब्ध था. सरकार ने जवाब दिया कि न केवल ऑनलाइन पोर्टल, बल्कि ऑन-साइट और वॉक-इन-रजिस्ट्रेशन की सुविधा भी दी गई है. इसके अवाला 1075 नंबर डायल और कॉमन सर्विस सेंटर्स के जरिए भी रजिस्ट्रेशन का विकल्प था.

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The Economist ने ये भी लिखा था कि जो ऐप आंगनवाड़ी वर्कर्स इस्तेमाल कर रहे थे, वह अंग्रेजी में थी, जो सबको समझ में नहीं आती. ऐप बार-बार हैंग होती रही. ज्यादातर के पास अच्छी नेटवर्क कनेक्टिविटी नहीं थी. इस पर सरकार ने अपने पत्र में लिखा है कि पोषण ट्रैकर ऐप 22 भाषाओं में थी. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को केवल बेनिफिशिरी का नाम ही अंग्रेजी में दर्ज करना होता था, बाकी की पूरी डिटेल लोकल भाषा में दिखती थी. ऐप का साइज महज 14 MB था, जोकि राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराए गए फोन्स पर आसानी से काम करती है. ये ऐप आंगनवाड़ी कार्यकताओं पर रजिस्टर मेनटेने करने के बोझ को कम करने के लिए लाई गई थी, ताकि उन्हें सुविधा हो. नेटवर्क की दिक्कत को ध्यान में रखते हुए ट्रैकर का ऑफलाइन मॉड्यूल भी उपलब्ध कराया गया.

आंगनवाड़ी वर्कर्स पर सवाल
द इकोनॉमिस्ट की तरफ से एक बिंदु ये भी लिखा गया था कि आंगनवाड़ी में एक अतिरिक्त हेल्पर देने के बाद भी 42 प्रतिशत का बड़ा ड्रॉप देखने को मिला है. फिर भी सरकार का आंगनवाड़ी ऑपरेटिंग बजट (मतलब भोजन और सेलरी) फ्लैट ही रहा है, जबकि टेकनोलॉजी पर खर्च काफी बढ़ गया है. आधुनिक और डिजिटल इकॉनमी बनने की दौड़ में भारत उन्हें पीछे छोड़ रहा है, जिन्हें कि सबसे ज्यादा लाभ मिलना चाहिए.

इस पर सरकार ने कहा है कि आंगनवाड़ी सेवा टीम में आंगनवाड़ी वर्कर्स, आंगनवाड़ी हेल्पर्स, सुपरवाइजर्स, चाइल्ड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर्स (CDPOs) और डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम ऑफिसर (DPOs) शामिल होते हैं. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और हेल्पर वो महिलाएं होती हैं, जिन्हें कि लोकल कम्युनिटी से चुना जाता है. ये महिलाएं आंगनवाड़ी सर्विस प्रोग्राम की कम्युनिटी आधारित फ्रंटलाइन वर्कर होती हैं. ये स्कीम फिलहाल एक नेटवर्क के माध्यम से 7075 प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है और मार्च 2021 तक 1.38 मिलियन आंगनवाड़ी वर्कर्स जुड़ी हुई हैं.

फिलहाल 1.33 मिलियन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और 1.18 मिलियन आंगनवाड़ी हेल्पर्स के माध्यम से सर्विस दी जा रही है. आंगनवाड़ी वर्कर्स को हेल्पर इसलिए दी गई हैं, ताकि सभी स्कीम्स का काम अच्छे से चले और उसका उद्देश्य पूरा किया जा सके.

उपरोक्त प्वाइंट्स के अलावा सरकार ने पब्लिक फूड सप्लाई स्कीम को लेकर उठाए गए सवाल को भी सरकार ने खारिज किया है. सरकार ने इसके लिए आंकड़े देते हुए कहा है कि Targeted Public Distribution System (TPDS) में पिछले 6-7 सालों में काफी सुधार देखा गया है. और टेक्नोलॉजी ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है.

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